आज जब बैठा था थोड़ा सुस्ताने दिन के दूसरे पहर में,
यकायक स्मरण हो आई पिछले महीने की छोटी सी हार
फिर जज्बातों को कुछ यूं हौसला दिया कि उस हार ने आखिर मेरी तहरीर ए ज़िंदगी कितनी बढ़ा दी, अब यकीं हो चला कि
हो चाहे जो भी हार तो कतई मेरे मुक्कदर में न होगी
एक दिन नागरी के मान्य अंको में जबर आहट होगी
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