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Thursday, January 16, 2025

नए जज़्बात

 आज जब बैठा था थोड़ा सुस्ताने दिन के दूसरे पहर में,

यकायक स्मरण हो आई पिछले महीने की छोटी सी हार 

फिर जज्बातों को कुछ यूं हौसला दिया  कि उस हार ने आखिर मेरी तहरीर ए ज़िंदगी कितनी बढ़ा दी, अब यकीं हो चला कि 

हो चाहे जो भी हार तो कतई मेरे मुक्कदर में न होगी 

एक दिन नागरी के मान्य अंको में जबर आहट होगी 

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